मंगलवार, 31 अगस्त 2010

माँ, मैं और तुम!



सूरज निकलता है और शाम में ढलता है,
ऋतुएं बदलती है और काल-चक्र चलता है. 
बस तुम नहीं हो..... 
अब मैं बिन कहे माँ के दिल 
की हर बात जान लेता हूँ...
उसके हर कहे-अनकहे बातों को 
बेहिचक मान लेता हूँ...
मैं यह सोच खुश हूँ,
माँ बहुत खुश होगी..
पर माँ को लगता है 
मैं चुप हूँ और मेरी ख़ामोशी
बहुत बोलती है..
सुनती ख़ामोशी की सदाओं  को मेरी
और हर पल उन्हें तोलती है
कहती है, तू बहुत बदल गया है,
तन्हाई के सांचे में ढल गया है,
एक अजीब सा ठहराव सा आने 
लगा है तेरी गति में..
तू आदमी नहीं मशीन हो गया है,
नूतन नवीन जीवन में प्राचीन हो गया है.
अब मैं माँ को बावला सा नज़र आने लगा हूँ,
और माँ मुझे बावली सी...
उसे नज़र आती हैं तुम्हारी स्याह यादें,
प्रत्यक्ष, परोक्ष एवं उतावली सी..
तुम्हे गए ज्यादा वक़्त तो नहीं हुआ,
तुम नहीं हो..
फिर भी किसी निराशा ने तो मुझे नहीं छुआ...
मैं मुस्कुराता हूँ,
ये बातें, माँ को समझाता हूँ,
कहता हूँ माँ देख..
सब कुछ तो यथोचित ही तो चल रहा है,
कल भी यूँ ही जलता था ये सूरज 
आज भी तो जल रहा है..
कहती है वो, सब कुछ तो नहीं है वैसा,
कहता है तू मुझसे जैसा..
कल तक तू तो बच्चा था, 
अचानक से बड़ा हो गया है,
पहले दूर हो कर भी पास था,
अब पास हो कर भी कहीं खो गया है.
तू भी तो यहीं चाहती थी न माँ, 
कि मैं बड़ा हो जाऊं?  
याद है तुझे .. बिन बात मैं तुझसे कितना लड़ता था,
जो चाहा वही किया,अपनी हर जिद पर बेवजह अड़ता था..
वो चुप हो जाती है, मुस्काती है,
पर कुछ न कहती है,
हर पल जाने किस सोच को 
मथती रहती है..
उसकी इस हालत पर मैं हूँ हैरान,
मेरे रवैये पर वो है परेशान..
दोनों सोचते हैं, 
तुम्हारे ना होने भर से ये बदलाव कैसा?
वक़्त के साथ कदम ताल करते हुए भी,
जीवन से ये अलगाव कैसा?
वो नहीं जानती है...
मैं नहीं जनता हूँ,
कि तुम क्यों नहीं हो..... 



 

बुधवार, 25 अगस्त 2010

स्वप्न सुंदरी




उड़ते बादल ने  एक  चेहरा बुना
मासूम, मोहक, मदमस्त
कुछ सुना कुछ अनसुना
चेहरे की मुस्कुराहट देख
पागल दिल ने एक गीत बुना

हवा ने की छेड्खानी
तेरी जुल्फों को बिखेरा
माथे पर सरक आई एक लट
और मेरा देखना एक टक

तेरा यूँ हडबडा जाना 
आँचल का सर-सराना
सुध बुध का खोना
पलकों का बिछोना

वो कमसिन सी कली 
महकी गली-गली
कमाल सी लचक
माधुर्य ज्यों मिश्री की लड़ी

  वो यौवन वो जवानी
अविरल बहता पानी
मुँह फेर लेना बालों को झटक
हाय ये अदा जानी पहचानी
 

हवा से बादल का उड़ जाना
मध्ध्म होते-होते उस चेहरे का खो जाना
सपने की टूटन , आंखो का खुल जाना
नींद से जागना और स्वप्न सुंदरी का खो जाना

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

सपनों की दुनिया



सपनों की दुनिया  
न आदि न अंत
अविरल अनंत
सुसुप्त जीवंत
दुखांत-सुखांत
सपनों की दुनिया ....

छोटी सी टोकरी
लाल पीले कपड़ों की कतरन
कुछ खिलौने एक  सन्दुक
डेहरी पर रखी मुनिया
सपनों की दुनिया

एक  राजा एक  रानी
वो आँधी वो पानी
एक भूल एक नादानी
एक  छोटी सी गुड़िया
सपनों की दुनिया

हसी की निरंतरता
गम की बारम्बारता
सकुचाई लजाई 
लाल जोड़े की कनिया
सपनों की दुनिया

कभी नून कभी तेल
एक  सिपाही एक  जेल
परचून की दुकान
कंही सुनार , कंही बनिया
सपनों की दुनिया

अंधेरा निशाचर
रौद्र  कभी कातर
इतराती- इठलाती
लाल जोडे में दुल्हनिया
मेरे सपनों की दुनिया 

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

अन्नत यात्रा




अन्नत यात्रा

जल थल खुले मैदान
बाग बगीचे खेत खलिहान
पथरीले पहाड़ या अरण्य सघन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

जो चाहा करता गया
जीता गया –  मरता गया
बारिश बटोर , शबनम चुन
अपना घड़ा  भरता  गया
सुनता रहा मन मंदिर का कथन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

कुमुदनी से महक चुराता
मृगनयनी से नयन मिलता
बगिया-बगिया फूल खिलता
मारीचिका   से बचता बचाता
घनश्याम नैनों में लिया लगन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला  अपनी धुन में मगन

ना भीड़ का  हिस्सा बना
ना झुका , ना ही तना ...
ना जुलूस न भाषण,
कोई कहानी न किस्सा बना
छू न  सकी उसे थकन
चलता रहा चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

कभी केचुले बदल
कभी शाम में ढल
पत्थर सा जम
मोम सा पिघल
मन में  पोषे भानू सा तपन
चलता रहा -चलता रहा
मतवाला अपनी धून व मगन

बरसा जैसे काली बदरी
गाता फिरता सावन की कजरी
फिरता मुसकता
गाँव गाँव नगरी नगरी
छाता रहा ज्यो सदृश्य गगन
चलता रहा .चलता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन

चीर काल  से अनंत
बढ़ता  रहा –  बढ़ता रहा
मतवाला अपनी धुन में मगन