शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

खँडहर





गहरे ज़ख्मों को तन से लगाये,
हालाती थपेडों से चोट खाए,
कभी धूल-धूसरित, कभी बरखा में नहाये।

हर-दम सुनता हूँ उन्हें, बाते करते, इधर से आते जाते,
गाते गुन-गुनाते, बुद-बुदाते,
अपने वर्तमान पर अफ़सोस जताते।

कई दौरों के गवाह, कई युगों से मूक दर्शक बन,
धूप में तप, समय की बेदी पर छन,
खड़े हैं सर ऊँचा कर आसमां में, नंगे तन।

कुछ किवन्दन्तियाँ , कुछ जग जाहिर, कुछ जानी-अनजानी,
हर एक ईट, हर एक पत्थर सुनाता है एक कहानी,
कही खरोचों,कहीं ख़राशों, कभी खामोशी की जुबानी।

ये ईमारत और इसकी हर दीवार, वक़्त के साथ बदल जाते हैं,
कुछ खड़े हैं, कुछ गिरते हैं, कुछ शाम के साये में ढल जाते हैं,
शालीनता से मुस्कुराते हैं, अपनी यादों में जल जाते हैं।

गवाही देते रहते हैं अपने गौरवशाली अतीत का,
वक्त के के साथ बदल जाने की, प्रकृति के रीत का,
किसी कोने में कैद नफ़रत तो दिल में दफन प्रीत का,
अपनी हार और काल-चक्र के जीत का।

सोचता हूँ , शायद हर गौरवशाली अतीत का वर्तमान खँडहर ही होता होगा!

मंगलवार, 23 जून 2009

पगली

खामोशी से कुरेद रहा था सपनों को
बेगाने से आशियाने में ढूंढ़ रहा था अपनो को.
यूं हीं एक आहाट पे दरवाजा खोला दस्तक थी ज़िन्दगी की,
खड़ी थी सामने...
एक पगली..झिझकती, ठिठकती..कुछ अलसाई सी.
एक सौगात, एक मुलाक़ात, जीवन की परछाई सी.

छिटक सी गयी धूप चहू ओर, सामने थी एक परी
एक मासूम की अल्हड अंगडाई सी...
मेज पर फैले कागज़, उडाती, दरख्तों से धूल हटाती
खिड़की से आ घर में भर गयी एक शीतल पुरवाई सी..

खामोश सा मंज़र खिल उठता है उसके आमग भर से
महकी-महकी सी लगती है अब तो तन्हाई भी.
जीने लगा हूँ कई जिंदगियां हर पल में मैं
अब तो प्यारी लगती हैं
उसकी बेरुखी, उसकी हर रुसवाई भी.

उन आँखों में तैरते हैं कई सपने
लगती है ये ऑंखें कभी अपनी, कभी बेगानी तो कभी सौदाई सी..
एक पगली..झिझकती, ठिठकती..कुछ अलसाई सी.
एक सौगात, एक मुलाक़ात, जीवन की परछाई सी.

गुरुवार, 14 मई 2009

वो (भाग-2)


(मेरे प्यारे से दोस्त गोल्ड फिश को समर्पित)

रात-दिन ताना-बाना बुनती रहती है वो
फिर उलझाती है खुद को उन्ही तानों में,
मथती रहती न जाने क्या हरदम, गुम हो अपने ही ख्यालों में,
बल पड़ते हैं सोच-२ उसके पेशानी पर।

समझ पाई है रिश्तों के भ्रम-जाल को
खीजती है कभी, रोती है कभी,
कभी गुमसुम, तो कभी हँस लेती है,
रिश्तों को निभाने में दिखलाई अपनी नादानी पर

ढका है रूह अनगिनत खरोचों से,
जो बयाँ करते है हालत उसके जिस्मो-दिल की
ओढ़ के गुस्सा, रस्मों को लपेट बदन से,
दिल के चिथडों को सिलती रहती है

दफ़्न करती है हर साँस को सीने में यूँ
मानो एहसान कर रही है जी कर किसी पर
मुस्कुराती है, जब पाती है ख़ुद को ख़ुद के क़रीब,
अक्सर ख़ुद से बातें करती रहती है

देखती रहती है खिड़की से बाहर बदहवास दौड़ते उस सड़क को,
जहाँ कभी रखा था बड़े सुकून से काँधे पर 'उसके', अपना सर
अब ऑंखें खड़ी- खड़ी जागती रहती हैं,
और आस जगते-जगते सोने लगती है

यूँ उठा है अपनो से भरोसा कि
घेर दिया है शर्तो के चक्रव्यूहु में ज़िन्दगी को
अब, ज़िन्दगी छोटी
जीने की शर्ते बड़ी लगती हैं

कोई सज़ा-याफ़्ता क़ैदी है वो,
या शायद सज़ा मिली है उसे लड़की होने की.........

शनिवार, 9 मई 2009

वो-१

रिश्तों में आई दूरियों को
बालिस्तों से नापने बैठा है वो,
अपने गुनाहों को गिन,
ढापने बैठा है वो।

अपने दायरों से रु-ब-रु होने की ख्वाहिश है उसे,
जिन्हें अक्सर वो भूल जाता है,
बैठ साँझ को कुरेदता फिरता है
और यादों के साये में झूल जाता है।

तिनका तिनका जोड़ एक घरौंदा बनता है,
फिर उसे तोड़ने लगता है।
माले से नोच मोतियों को एक-२ कर बिखेर देता है,
उन्हें चुनता और जोड़ने लगता है।

पागल है शायद, पागल ही होगा!

बीते कल में अगले कल के निशान
ढूंढ़ रहा है वो,
डर लगता है उजाले से उसे,
तो उजाडे में ऑंखें मूंद रहा है वो।

अब अपने साये से भी डरने लगा है ,
अंधेरे का दामन थामे जी रहा है वो।
पास आते-२ सब दूर हो जाते हैं उससे,
अपने ही आदतों के कड़वे घूँट पी रहा है वो.

उसके गुनाहों की फेरहिस्त लम्बी होगी.......... शायद........


सोमवार, 13 अप्रैल 2009

मेरे सपने

दालान में बैठ खुद से बतियाते,
पलकों पर मुस्कुराते
रात रानी की तरह खुद पर इतराते,
आँसुओं में डूबते -उतराते,
नींद की देहरी लांघने को छट-पटाते,
आँखों में कैद, बेचैन, पर फड- फडाते
मेरे सपने

गुलाबी रातों के वो नीले सपने,
कोहरे से ढकी वादी,
धुंध में गुम कुछ गीले सपने,
रैक पर धूल फांकती किताबें,
और उनमे दफन मेरे पीले सपने.

अपनी ही आँखों में बेगाने,
कुछ नए कुछ पुराने,
कुछ जाने कुछ अनजाने,
सारी रात दिए की तरह टिम टिमाते हैं
लडखडाते हैं और फिर संभल जाते हैं
एक हलके स्पर्श से बिखर जाते हैं,
रात दिन जगती आँखों से देखे जाते हैं
ये.... मेरे सपने...............